राव सिरदार वंश केवल कागज़ का विवरण नहीं — यह स्मृति की साधना है। हमारा इतिहास पुरोहितों की बहियों में, पूर्वजों की सनदों की पंक्तियों में, चारण-कवियों के छन्दों में, तथा धर्म, विद्या एवं शौर्य के नित्य आचरण में जीवित है।
निम्न एक संक्षिप्त कालक्रम है जो केंद्रीय समिति द्वारा संकलित है। कुछ नाम पुरातन अभिलेखों से सत्यापन की प्रतीक्षा में हैं; सदस्यों से अनुरोध है कि अभिलेख, स्मृतियाँ एवं सुधार कार्यालय को प्रेषित करें।
कालक्रम
- १३वीं शताब्दी
वंश की स्थापना
मारवाड़ के क्षात्र-कुलों से राव सिरदार वंश का उदय होता है — दुर्ग, मन्दिर एवं वचन के संरक्षक। राजदरबार की सेवा हेतु पूर्वजों को जागीरें प्रदान की जाती हैं।
- १६वीं – १७वीं शताब्दी
मारवाड़ के सेनानायक
हमारे पूर्वज मारवाड़, मेवाड़ एवं शेखावटी में सेनानायक और राजदूत के रूप में सेवा करते हैं — दुर्ग निर्माण, सन्धि-वार्ता तथा डिंगल-परम्परा के कवियों का संरक्षण।
- १८वीं शताब्दी
दरबार के राजनीतिज्ञ
कुल के सदस्य मारवाड़ दरबार के दीवान एवं फौजदार पदों पर आसीन होते हैं। पैतृक गाँवों में मन्दिरों का निर्माण; प्रथम समाज-अभिलेख बहियों में संग्रहीत किए जाते हैं।
- १९वीं शताब्दी
विद्वान-कवि एवं संरक्षक
विद्वत्ता का युग — कुल के कवि, संस्कृतज्ञ एवं इतिहासकार जोधपुर, बीकानेर तथा जयपुर के दरबारों में योगदान देते हैं। सनदों द्वारा अभिलेखों की रक्षा होती है।
- २०वीं शताब्दी
स्वदेशी एवं नवीन गणराज्य
समाज के पुत्र स्वदेशी आन्दोलन तथा भारतीय सेना में सम्मिलित होते हैं; पुत्रियाँ स्वाधीनता संग्राम एवं प्रथम प्रशासनिक सेवा में प्रवेश करती हैं। १९७८ में अखिल भारतीय समाज की स्थापना।
- आज
विस्तीर्ण धर्म
भारत एवं प्रवास में फैले सदस्य — सैनिक, विद्वान, उद्यमी, कलाकार।